दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि आपराधिक कानूनों के तहत आपराधिक दायित्व से छूट पाने के लिए मुस्लिम पर्सन...
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि आपराधिक कानूनों के तहत आपराधिक दायित्व से छूट पाने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ का आधार नहीं लिया जा सकता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत बच्चों को मिली कानूनी सुरक्षा के ऊपर पर्सनल लॉ को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती. इसके साथ ही कोर्ट ने एक मुस्लिम व्यक्ति को अपनी नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने के मामले में 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम' (POCSO) के तहत मुकदमा चलाने का सख्त निर्देश दिया है.
🚫 2. जस्टिस संजीव नरूला की बेंच की टिप्पणी- शादी से बच्ची की उम्र नहीं बढ़ती, POCSO और BNS में सहमति की उम्र 18 साल
जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने BNS की धारा 64(1) और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए अपने 23 पन्नों के आदेश में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध बताई गई शादी भी पत्नी के साथ यौन संबंध के मामले में तब तक छूट नहीं दिला सकती, जब तक पत्नी की उम्र 18 साल से कम है. कोर्ट ने कहा कि शादी की रस्म पूरी होने से बच्ची की उम्र नहीं बढ़ती; जो व्यक्ति शादी से पहले 16 साल का है, वह कानूनी रूप से नाबालिग ही रहता है और कानून में सहमति की न्यूनतम उम्र 18 साल तय की गई है.
📋 3. अस्पताल में गर्भधारण के दौरान खुला मामला, कोर्ट ने कहा कि इससे POCSO कानून का मूल उद्देश्य ही उलट जाता
मामले के अनुसार, 28 वर्षीय व्यक्ति ने 2024 में 16 साल से अधिक उम्र की युवती से शादी की थी, जिसका खुलासा तब हुआ जब वह 8 महीने की गर्भवती होने पर दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंची. जोड़े ने परिवारों की सहमति और पर्सनल लॉ के तहत शादी को वैध बताते हुए एफआईआर रद्द करने की मांग की थी, जिसे ठुकराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में पर्सनल लॉ के आधार पर बचाव मिलने लगा, तो POCSO कानून का असर ही खत्म हो जाएगा और कानूनी सुरक्षा उम्र की बजाय शादी पर निर्भर होने लगेगी.

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