दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी का गुज़ारा-भत्ता (Maintenance) देने की कान...
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी का गुज़ारा-भत्ता (Maintenance) देने की कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए शादी से जुड़े उस विवाद को बार-बार नहीं उठा सकता, जिसका फैसला निचली अदालतों द्वारा पहले ही पक्के तौर पर तय किया जा चुका है। जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने एक पति की पुनर्विचार याचिका को सिरे से खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
📜 2. साल 2002 में हुई थी शादी, 2008 में पत्नी ने दाखिल की थी भरण-पोषण की याचिका
इस मामले के अनुसार, दोनों की शादी वर्ष 2002 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी, जिसके बाद पति ने 2003 में विवाह को नकारने के लिए मुकदमा दायर किया था। हालांकि, लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2011 में पति की दूसरी अपील खारिज कर दी गई, जिससे पत्नी के पक्ष में फैसला बरकरार रहा। इस बीच, पत्नी ने साल 2008 में ही सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण पाने के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी थी, जिस पर फैमिली कोर्ट ने पति को बकाये और नियमित राशि का भुगतान करने का आदेश दिया था।
🚫 3. हाईकोर्ट ने पति के तर्कों को नकारा, कहा—पहले के अंतिम और निर्णायक फैसलों से बंधा हुआ है याचिकाकर्ता
हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान पति ने फिर से वही पुराना तर्क दिया कि महिला उसकी वैध पत्नी नहीं है और पूर्व का फैसला तकनीकी आधार पर था। हालांकि, पीठ ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि शादी का मुद्दा पिछली कार्यवाहियों में पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुका है। अदालत ने साफ किया कि याचिकाकर्ता अब बाद के मुकदमों में उन्हीं तय हो चुके पुराने मुद्दों को दोबारा उठाकर कानूनी नतीजों से भाग नहीं सकता, और इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।

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