धार्मिक नगरी उज्जैन में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। यहां स्थित प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में ज...
धार्मिक नगरी उज्जैन में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। यहां स्थित प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी के मौके पर करीब 200 साल पुरानी अनोखी परंपरा आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती है। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा भले ही युवा स्वरूप में है, लेकिन जन्माष्टमी के पावन पर्व के बाद उन्हें नवजात बालक के रूप में माना जाता है, जिसके चलते बछ बारस तक मंदिर में भगवान की शयन आरती नहीं की जाती है।
👶 2. बाल स्वरूप मानकर नहीं होता सोने का निश्चित समय, बछ बारस पर मटकी फोड़ आयोजन के बाद फिर शुरू होती है परंपरा
द्वारकाधीश गोपाल मंदिर के पुजारी पंडित पावन शर्मा के अनुसार, जिस तरह छोटे बच्चे के सोने और जागने का कोई निश्चित समय नहीं होता, उसी प्रकार इस अवधि के दौरान भगवान के लिए भी सोने का कोई निर्धारित समय नहीं माना जाता है। जन्माष्टमी से शुरू होने वाली यह विशेष परंपरा बछ बारस तक चलती है। बछ बारस के दिन मंदिर में मटकी फोड़ का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसके संपन्न होने के बाद ही भगवान की शयन आरती की परंपरा को पुनः आरंभ किया जाता है।
🍬 3. भगवान को लगाया गया 1100 किलो पेड़े का महाभोग, गुरु सांदीपनि की शिक्षा स्थली से जुड़ा है उज्जैन का गहरा इतिहास
जन्माष्टमी के इस विशेष अवसर पर मंदिर में भव्य आयोजनों की श्रृंखला चल रही है। दोपहर के समय भगवान श्रीकृष्ण को 1100 किलोग्राम पेड़े का विशाल महाभोग अर्पित किया गया, जिसके बाद रात 12 बजे जन्मोत्सव मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन का भगवान श्रीकृष्ण से गहरा नाता है, क्योंकि उन्होंने यहीं महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी। 19वीं शताब्दी में बायजाबाई शिंदे द्वारा मराठा शैली में बनवाया गया यह मंदिर अपनी भव्यता और अनूठी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

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