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Yamuna Encroachments SC Hearing: यमुना को नाला बना दिया, अतिक्रमण और सीवेज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 22 सितंबर को अगली सुनवाई

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों ...


नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों और अवैध निर्माणों को अस्थायी सुरक्षा देने वाले कानून की समय-सीमा बार-बार बढ़ाए जाने से दिल्ली के प्रशासन में कामचलाऊ व्यवस्था (Ad-hocism) को बढ़ावा मिला है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस स्थिति के कारण यमुना नदी के तटबंधों और कैचमेंट एरिया से अतिक्रमण हटाने की किसी भी महत्वाकांक्षी कार्ययोजना पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। शीर्ष अदालत दिल्ली और पड़ोसी राज्यों से होकर बहने वाली पवित्र यमुना नदी के कायाकल्प व संरक्षण के लिए एक व्यापक 'यमुना एक्शन प्लान' (YAP) तैयार करने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। गौरतलब है कि इस साल मई में अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में यह वृहद प्लान तैयार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था।

📜 "20 साल से लागू नहीं होने दिया गया मास्टर प्लान": जस्टिस मनमोहन व जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच के कड़े सवाल

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि 'नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली लॉज (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 2006' के तहत दी जा रही लगातार कानूनी सुरक्षा के कारण प्रस्तावित एक्शन प्लान को धरातल पर उतारना बेहद चुनौतीपूर्ण है:

  • कामचलाऊ व्यवस्था: पीठ ने कहा, "देखिए, देश की राजधानी का कामकाज किस तरह कामचलाऊ तरीके से चलाया जा रहा है। दिल्ली के लिए एक मास्टर प्लान तैयार है, लेकिन उसे बीते 20 वर्षों से लागू ही नहीं होने दिया गया।"

  • कानून की बार-बार बढ़ती अवधि: 2006 का यह कानून मूल रूप से एक अस्थायी राहत के रूप में लाया गया था ताकि अवैध कॉलोनियों को सीलिंग और तोड़-फोड़ से बचाया जा सके। हालांकि, इसे बार-बार विस्तारित किया गया और अंतिम बार इसे दिसंबर 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

  • विफल हो सकती है कवायद: बेंच ने आगाह किया कि यदि 2006 का एक्ट हर अवैध निर्माण को ढाल प्रदान करता रहेगा, तो यमुना एक्शन प्लान का क्रियान्वयन असंभव हो जाएगा और पूरी कवायद निरर्थक साबित होगी।

🌊 राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और अतिक्रमण: पीठ ने साझा किया निजामुद्दीन वेस्ट का उदाहरण

सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को अवगत कराया कि 'दिल्ली 2047 Master Plan' को अंतिम रूप दे दिया गया है। इस पर अदालत ने कहा कि राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बिना मास्टर प्लान का कोई औचित्य नहीं रह जाता:

  • निजामुद्दीन का वाकया: जस्टिस मनमोहन ने दिल्ली हाईकोर्ट के अपने कार्यकाल का अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे निजामुद्दीन वेस्ट क्षेत्र में बनी एक अवैध बस्ती ने यमुना के प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर दिया था। मॉनसून के दौरान पानी का बैकफ्लो हुआ और महारानी बाग जैसे रिहायशी इलाकों में पानी भर गया।

  • कानूनी अड़चन: उन्होंने बताया कि जब न्यायपालिका ने उस अवैध बस्ती को हटाना चाहा, तो राजनीतिक प्रशासन ने 2006 के एक्ट का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए। जब तक इस कानून के संरक्षणत्मक प्रावधानों में संशोधन नहीं होता, तब तक कोई भी एक्शन प्लान प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

🚨 सीवेज नाले में तब्दील हुई यमुना: कड़े फैसले लेने और नमामि गंगे जैसी रणनीति बनाने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि दिल्ली के संवेदनशील जोन 'O' में नदी के तल (Riverbed) पर अवैध कब्जे, गैर-कानूनी फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले रसायनों के बहाव और अनधिकृत कॉलोनियों के बिना ट्रीट किए गए सीवेज ने यमुना को एक गंदे नाले में बदल दिया है:

"अतिक्रमण हटाना, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को तत्काल बंद करना और अनधिकृत कॉलोनियों के निवासियों का उचित पुनर्वास करना—ये ऐसे कड़े फैसले हैं जो अब लेने ही होंगे। केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और संबंधित राज्यों को आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होकर काम करना होगा।"

अदालत ने कमेटी को 'नमामि गंगे कार्यक्रम' की तर्ज पर एक दीर्घकालिक, एकीकृत रणनीति तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसमें स्पष्ट उद्देश्य, कार्यान्वयन समय-सीमा, वित्तीय आवंटन और विभिन्न विभागों की जवाबदेही तय की गई हो। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।







 

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