राखी का धागा सिर्फ एक रेशम की डोर नहीं बल्कि जीवन भर रक्षा करने का वो वादा है, जिसे इस बार बहनों ने पूरी शिद्दत से निभाया है। जब किडनी की बी...
राखी का धागा सिर्फ एक रेशम की डोर नहीं बल्कि जीवन भर रक्षा करने का वो वादा है, जिसे इस बार बहनों ने पूरी शिद्दत से निभाया है। जब किडनी की बीमारी के चलते दो भाइयों की सांसें संकट में थीं, तब उनकी बहनों ने बिना अपनी परवाह किए भाइयों को किडनी दान कर जीवनदान दिया। उत्तराखंड के किच्छा निवासी 40 वर्षीय जितेंद्र गंगवार पिछले दो साल से क्रॉनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे थे। उनकी तकलीफ देख 45 वर्षीय अविवाहित बहन बीना गंगवार ने अपनी किडनी देने का फैसला किया और जुलाई के अंत में ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में सफल प्रत्यारोपण हुआ। इसी तरह सुप्रियो की जान बचाने के लिए भी उनकी बहन सोनाली ने आगे आकर अपनी किडनी दान की।
👶 2. मामा ने अपनी पांच महीने की भांजी को लिवर का हिस्सा देकर बचाई जान
दिल्ली में भी रक्षाबंधन से पहले भाई-बहन के रिश्ते की एक अनूठी मिसाल देखने को मिली। केवल 24 साल के एक युवक ने अपनी पांच महीने की भांजी की जान बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान कर दिया। सांविका शुक्ला को जन्म के बाद गंभीर पीलिया और पित्त नलिकाओं में रुकावट के कारण लिवर की गंभीर क्षति हो गई थी। जब माता-पिता और दादी मेडिकल जांच में डोनर के रूप में उपयुक्त नहीं पाए गए, तब बच्ची के मामा सिवेंद्र कुमार पांडे ने लिवर का हिस्सा देने का फैसला किया। फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग में यह जटिल पीडियाट्रिक लिवर ट्रांसप्लांट सफल रहा।
🏥 3. मूलचंद अस्पताल में दो छोटे भाइयों ने बड़ी बहन को दी नई जिंदगी
दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में भी भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की एक और प्रेरक मिसाल सामने आई, जहां दो छोटे भाइयों ने किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रही अपनी बड़ी बहन को किडनी दान कर नया जीवन दिया। मूलचंद किडनी ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के निदेशक डॉ. मनोज अग्रवाल ने बताया कि पीयूष चौधरी ने अपनी 48 वर्षीय बहन सारिका चौधरी को और 31 वर्षीय मोहम्मद आलम ने अपनी 40 वर्षीय बहन शीमू चौधरी को किडनी दान की। आधुनिक तकनीक और एआई आधारित सुविधाओं की मदद से हुए इन सफल ट्रांसप्लांट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि पारिवारिक रिश्ते ही इंसान की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

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