नई दिल्ली: दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली रेस क्लब द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा जारी किए ग...
नई दिल्ली: दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली रेस क्लब द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए बेदखली आदेश पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने एस्टेट ऑफिसर द्वारा 'पब्लिक प्रीमिसेस एक्ट' (Public Premises Act) के तहत जारी 15 दिनों के परिसर खाली करने के नोटिस पर स्टे देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने माना कि क्लब के अधिकारी बेदखली आदेश पर रोक लगाने के लिए कोई मजबूत प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आधार पेश करने में विफल रहे हैं।
📍 1994 से रिन्यू नहीं हुई लीज: पीएम आवास के सामने लुटियंस दिल्ली में स्थित है क्लब
मामले की पृष्ठभूमि और जगह का महत्व:
प्राइम लोकेशन: दिल्ली रेस क्लब सेंट्रल गोल्फ लिंक रोड पर प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास और दिल्ली गोल्फ क्लब के पास स्थित है। एक सदी से भी अधिक पुरानी इस घुड़दौड़ संस्था की लीज 1994 के बाद से नवीनीकृत (Renew) नहीं की गई है।
प्राकृतिक न्याय का तर्क खारिज: केंद्र सरकार की ओर से पेश सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसिल (CGSC) आशीष के. दीक्षित ने स्पष्ट किया कि 1994 के बाद लीज का नवीनीकरण नहीं हुआ था। कोर्ट ने पाया कि एस्टेट ऑफिसर ने क्लब को शिकायत की कॉपी देने के साथ जवाब दाखिल करने के पर्याप्त मौके दिए थे।
⚖️ 'सिर्फ किराया देने से लीज रिन्यू नहीं मानी जा सकती': कोर्ट की सख्त कानूनी टिप्पणी
क्लब की दलीलों पर अदालत का रुख:
"अदालत के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (PDSJ) पितांबर दत्त ने अंतरिम रोक की अर्जी खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि लीज समाप्त होने के बाद महज किराया देते रहने से अपने आप लीज का नवीनीकरण साबित नहीं होता। किराया स्वीकार करना और लीज का औपचारिक नवीनीकरण होना दो अलग कानूनी स्थितियां हैं।"
📜 रेस जुडिकाटा (Res Judicata) की दलील भी हुई फेल
कानूनी बहस का विवरण:
क्लब का तर्क: क्लब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुहैल दत्त ने तर्क दिया था कि 1999 में इसी संपत्ति से जुड़े शो-कॉज नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट रद्द कर चुका है, इसलिए यह मामला 'रेस जुडिकाटा' (एक ही मुद्दे पर दोबारा मुकदमा न चलाने का नियम) के तहत आता है।
अदालत का फैसला: कोर्ट ने रेस जुडिकाटा की दलील खारिज करते हुए कहा कि 1999 का पुराना नोटिस लीज की री-एंट्री क्लॉज के आधार पर नहीं था। इसलिए पुराने फैसले के आधार पर मौजूदा बेदखली कार्रवाई को रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

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