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Delhi High Court Ruling: दहेज उत्पीड़न केस में सास और ननदों को राहत, कोर्ट ने कहा- सामान्य आरोपों से साबित नहीं होती क्रूरता

दिल्ली हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और विश्वासघात से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए महिला की सास और ननदों को सभी आरोपों से मुक्...

दिल्ली हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और विश्वासघात से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए महिला की सास और ननदों को सभी आरोपों से मुक्त करने के सेशंस कोर्ट के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराया है। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब किसी वैवाहिक विवाद में परिवार के कई रिश्तेदारों पर एक साथ आरोप लगाए जाते हैं, तो यह बताना अनिवार्य होता है कि प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत भूमिका क्या थी। अदालत ने पाया कि इस मामले में ज्यादातर आरोप सभी पर सामूहिक रूप से लगाए गए थे, जिनकी कोई अलग से स्पष्टता नहीं थी।

🔍 सामान्य घटनाएं या असंवेदनशील व्यवहार कानूनी रूप से 'क्रूरता' नहीं: हाईकोर्ट की अहम कानूनी टिप्पणी

अदालत ने सास पर लगाए गए उस आरोप की भी समीक्षा की जिसमें शिकायतकर्ता से शारीरिक स्थिति के बावजूद घरेलू काम करवाने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह आरोप दहेज की मांग से संबंधित नहीं था और केवल यह बात 'क्रूरता' की कानूनी परिभाषा के दायरे में नहीं आती। ससुराल में होने वाली हर अप्रिय या आपत्तिजनक घटना अपने आप में अपराध नहीं बन जाती। इसके अलावा, मेडिकल रिकॉर्ड्स में गर्भपात (मिसकैरेज) को प्राकृतिक रूप से होना बताया गया था और ननद द्वारा जबरन दवाएं दिए जाने का कोई तत्कालीन साक्ष्य या रिकॉर्ड भी नहीं मिला था।

📜 धारा 406 और संपत्ति के मामलों पर अदालत का रुख: पति के खिलाफ भी पहले हो चुकी है कार्यवाही

आईपीसी की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के संबंध में कोर्ट ने कहा कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि सामान या गहने ससुराल पक्ष को सौंपे गए थे। यह साबित करना जरूरी होता है कि किस खास आरोपी के पास वह संपत्ति पहुंची और उसे वापस न करने की क्या जिम्मेदारी थी। इस मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, शादी फरवरी 2003 में हुई थी और मई 2004 में महिला को घर से निकाले जाने के बाद सितंबर 2004 में वीमेन सेल में शिकायत दी गई थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब हाईकोर्ट के इस फैसले से परिवार की महिलाओं को बड़ी राहत मिली है।







 

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