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Ganesh Utsav in Delhi NCR: दिल्ली-एनसीआर में छाई गणपति महोत्सव की धूम, मुंबई जैसी रौनक और परंपराओं का संगम

देशभर में इन दिनों गणेश चतुर्थी और गणपति महोत्सव का पावन पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जा रहा है. मुंबई के पंडालों की तर्ज पर अब दिल्ली-एनसीआर म...

देशभर में इन दिनों गणेश चतुर्थी और गणपति महोत्सव का पावन पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जा रहा है. मुंबई के पंडालों की तर्ज पर अब दिल्ली-एनसीआर में भी बप्पा की स्थापना को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है. राजधानी में कहीं पारंपरिक मराठी संस्कृति की झलक है तो कहीं मॉडर्न ट्रेंड और युवा पीढ़ी का जोश. दिल्ली में मनाया जाने वाला यह उत्सव सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि उन परिवारों की कहानी है जो महाराष्ट्र की मिट्टी, भाषा, स्वाद और परंपरा को संजोकर अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं.

🏛️ 2. 1984 से चली आ रही है पूर्वांचल महाराष्ट्र मंडल की परंपरा, दिल्ली में सक्रिय हैं 30 से ज्यादा गणेश मंडल

दिल्ली में मराठी समुदाय हर साल बड़े स्तर पर गणेशोत्सव का आयोजन करता है. आनंद विहार और ईस्ट दिल्ली के पूर्वांचल महाराष्ट्र मंडल की शुरुआत साल 1984 में हुई थी, जिसके बाद से लगातार यहां बप्पा की पूजा की जा रही है. महानगर की भागदौड़ के बीच लोगों ने अपने-अपने इलाकों में करीब 25 से 30 मंडल बना लिए हैं. कार्टूनिस्ट माधव जोशी जैसे कलाकार और स्थानीय लोग परंपराओं को निभाते हुए पांच, सात या दस दिनों तक बप्पा की सेवा करते हैं और पारंपरिक अनुष्ठानों को पूरी निष्ठा के साथ पूरा करते हैं.

🎨 3. महाराष्ट्र से लाई जाती हैं विशेष मूर्तियां, अब सिर्फ मराठियों का नहीं बल्कि पूरी दिल्ली का बन चुका है यह त्योहार

जनकपुरी में मूर्तियां बेचने वाली नीलिमा भागवत हर साल महाराष्ट्र से विशेष मूर्तियां मंगवाती हैं, जिनकी दिल्ली में भारी डिमांड रहती है. दिल्ली में गणेशोत्सव का इतिहास काफी पुराना है; साल 1919 में 'महाराष्ट्र स्नेह संवर्धक समाज' की स्थापना के साथ यहां के मराठी समुदाय का सामाजिक दायरा मजबूत हुआ था. हालांकि, आज यह त्योहार सिर्फ मराठी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि हिंदी भाषी और गैर-मराठी परिवार भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. महाराष्ट्र सदन, लक्ष्मी नगर और गुरुग्राम में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ यह उत्सव अब पूरी दिल्ली की संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुका है.







 

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