दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों को मातृत्व (प्रेग्नेंसी) या स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर मुश्किलों का सामना...
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों को मातृत्व (प्रेग्नेंसी) या स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर मुश्किलों का सामना कर रही महिला वकीलों के प्रति अधिक संवेदनशील और मानवीय रवैया अपनाना चाहिए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी ठोस और जायज कारण के चलते वकील सुनवाई में उपस्थित नहीं हो पाती हैं, तो इसका खामियाजा सीधे तौर पर मुवक्किल पर भारी जुर्माने के रूप में नहीं थोपा जाना चाहिए.
💸 2. जस्टिस अजय डिगपॉल की पीठ ने तीस हजारी कोर्ट के मामले में याचिकाकर्ता पर लगाया गया 25 हजार रुपये का जुर्माना किया रद्द
यह मामला तीस हजारी कोर्ट में चल रहे एक दीवानी मुकदमे से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता दिलबाग सिंह की ओर से पेश महिला वकील अदिति दराल 8 महीने की गर्भवती थीं और डॉक्टरों ने उन्हें आराम की सलाह दी थी. इसके चलते वह कुछ तारीखों पर पेश नहीं हो सकीं, जिस कारण निचली अदालत ने जिरह का मौका खत्म कर दिया था. सत्र अदालत ने मौका तो बहाल कर दिया, लेकिन 25 हजार रुपये का भारी जुर्माना लगा दिया, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता हाई कोर्ट पहुंचे थे.
👩⚖️ 3. ठोस कारण होने पर मुवक्किल पर भारी जुर्माने का बोझ डालना उचित नहीं, अदालत ने सत्र अदालत की शर्त को किया खारिज
जस्टिस अजय डिगपॉल की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए माना कि वकील का कार्यवाही में शामिल न हो पाने का कारण पूरी तरह से वास्तविक और ठोस था. अदालत ने कहा कि जुर्माने का उद्देश्य लापरवाही रोकना होता है, न कि जायज वजहों पर मुवक्किल को आर्थिक दंड देना. इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सत्र अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें जिरह की अनुमति देने के लिए 25 हजार रुपये जमा करने की शर्त रखी गई थी.

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