दुनिया में माता-पिता के प्यार को सबसे निस्वार्थ माना जाता है, लेकिन जब जन्म देने वाले ही अपनी संतान से मुंह मोड़ लें तो रिश्तों पर से भरोसा ...
दुनिया में माता-पिता के प्यार को सबसे निस्वार्थ माना जाता है, लेकिन जब जन्म देने वाले ही अपनी संतान से मुंह मोड़ लें तो रिश्तों पर से भरोसा उठ जाता है। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने ऐसे ही एक अत्यंत संवेदनशील मामले में जन्मजात बीमारी से पीड़ित नवजात बच्ची को अस्पताल में बेसहारा छोड़कर भाग जाने वाले उसके माता-पिता को दोषी ठहराया है। एडिशनल सेशंस जज सुनील कुमार की अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे को किसी स्थान पर छोड़कर उसकी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुंह मोड़ लेना कानून की नजर में गंभीर परित्याग (Abandonment) माना जाता है।
🏥 2. दिसंबर 2014 में डीडीयू अस्पताल में हुआ था बच्ची का जन्म, कम वजन और स्वास्थ्य समस्याओं के बाद माता-पिता हुए थे फरार
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 12 दिसंबर 2014 को हरीना राय उर्फ रीना ने डीडीयू अस्पताल में एक बच्ची को जन्म दिया था। बच्ची का जन्म समय से पहले होने के कारण उसका वजन कम था और वह कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रही थी, जिसके चलते उसे एनआईसीयू में भर्ती किया गया था। बच्ची के पिता जीतू कुमार ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर अपना मोबाइल नंबर दर्ज कराया और इसके बाद पति-पत्नी दोनों अस्पताल से फरार हो गए। महीनों तक संपर्क करने की कोशिश के बावजूद उनका फोन बंद मिला, जिसके बाद पुलिस ने अस्पताल के रिकॉर्ड और डीएनए जांच के जरिए आरोपियों तक पहुंच बनाई।
🩺 3. कोर्ट ने खारिज की बचाव पक्ष की दलील, कहा—डॉक्टरी देखभाल की जरूरत के समय माता-पिता का कर्तव्य था कि वे बच्ची की संभाल करते
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सफाई दी कि उन्हें डॉक्टरों ने जाने के लिए कहा था और उनका इरादा बच्ची को छोड़ने का नहीं था, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्ची को गंभीर चिकित्सकीय देखभाल की सख्त जरूरत थी और ऐसे में माता-पिता का यह नैतिक व कानूनी कर्तव्य बनता था कि वे उसकी देखभाल करते। मार्च 2015 में निर्मल छाया संस्था को सौंपे जाने के बाद तबीयत बिगड़ने से बच्ची की मौत हो गई थी। अदालत ने आरोपियों के इस गैरजिम्मेदाराना आचरण को परित्याग की मंशा मानते हुए आईपीसी की धारा 317 और 34 के तहत दोषी करार दिया है।

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