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Loco Pilot Micro Sleep AI Monitoring: रात 2 से 5 बजे के बीच लोको पायलटों को आ रही झपकी, रेलवे सुरक्षा को लेकर उठे सवाल

एआई कैमरे ने खोली रेल सुरक्षा की पोल! वंदे भारत, राजधानी और शताब्दी के ड्राइवरों में ‘माइक्रो स्लीप’ का खतरा; तड़के 2 से 5 बजे के बीच चौंकान...


एआई कैमरे ने खोली रेल सुरक्षा की पोल!

वंदे भारत, राजधानी और शताब्दी के ड्राइवरों में ‘माइक्रो स्लीप’ का खतरा; तड़के 2 से 5 बजे के बीच चौंकाने वाले संकेत

हर तीसरे लोको पायलट के माइक्रो-स्लीप का दावा, 500 से ज्यादा ड्राइवरों पर हुआ प्रायोगिक परीक्षण
नीरज अवस्थी

नई दिल्ली। भारतीय रेलवे की हाई-स्पीड ट्रेनों की रफ्तार भले ही आधुनिक तकनीक के सहारे बढ़ रही हो, लेकिन अगर इंजन के केबिन में बैठे लोको पायलट की आंखें कुछ सेकंड के लिए बंद हो जाएं तो यही रफ्तार भयावह हादसे में बदल सकती है। रेलवे के पायलट प्रोजेक्ट के तहत लगाए गए ड्राइवर अलर्टनेस एंड फटीग मॉनिटरिंग सिस्टम के कथित ट्रायल डेटा ने रेल सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

रेलवे सूत्रों के मुताबिक, एआई आधारित कैमरों से देश के अलग-अलग मंडलों में 500 से अधिक लोको पायलट और सहायक लोको पायलटों की ड्यूटी के दौरान आंखों की गतिविधि और चेहरे के भावों की निगरानी की गई। इस निगरानी में खासतौर पर रात 2 बजे से तड़के 5 बजे के बीच माइक्रो-स्लीप के संकेत सामने आने का दावा किया गया है। सूत्रों का दावा है कि इस अवधि में लगभग हर तीसरे ड्राइवर में माइक्रो-स्लीप के लक्षण दर्ज हुए।

यह दावा सही है तो सवाल केवल ड्राइवर की झपकी का नहीं, बल्कि रेलवे के रनिंग स्टाफ की ड्यूटी व्यवस्था और संरक्षा व्यवस्था का है।

कुछ सेकंड की झपकी, हजारों यात्रियों की जिंदगी!

माइक्रो-स्लीप ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति कुछ सेकंड के लिए अनजाने में नींद में चला जाता है। ट्रेन की तेज रफ्तार में ये चंद सेकंड भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। एआई कैमरा सिस्टम चालक की आंखों की पुतलियों, आई-ब्लिंक और चेहरे के भावों को लगातार ट्रैक करता है। नींद या ध्यान भटकने के संकेत मिलने पर सिस्टम ऑडियो अलर्ट के जरिए चालक को चेतावनी देता है।

रेलवे ने सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए पिछले वर्ष से इस तकनीक का ट्रायल शुरू किया था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अब तक करीब 1,200 से 1,500 इलेक्ट्रिक और डीजल लोकोमोटिव में यह सिस्टम लगाया जा चुका है।

लेकिन तकनीक ने अगर थकान पकड़ ली है तो अगला सवाल और बड़ा है—क्या रेलवे ने उस थकान की वजह भी पकड़ी है?

ड्यूटी 12-14 घंटे, आराम कहां?

लोको पायलटों के संगठन एआईएलआरएसए का आरोप है कि रनिंग स्टाफ की कमी के कारण मौजूदा कर्मचारियों पर काम का अतिरिक्त दबाव है। संगठन के मुताबिक कई ड्राइवरों से लगातार 12 से 14 घंटे तक ट्रेन चलवाई जा रही है और कई मामलों में साप्ताहिक विश्राम नहीं मिल पाने की शिकायतें हैं।

भारतीय रेलवे में स्वीकृत पदों के अनुसार लोको पायलट और सहायक लोको पायलट का कैडर एक लाख से अधिक बताया जाता है। ऐसे में यदि वास्तव में रनिंग स्टाफ के पद खाली हैं और इसका असर ड्यूटी घंटों पर पड़ रहा है, तो यह केवल कर्मचारियों की समस्या नहीं बल्कि सीधे यात्री सुरक्षा का सवाल बन जाता है।

रेलवे की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल

इस पूरे मामले पर आधिकारिक पक्ष जानने के लिए सरकार के प्रवक्ता से जानकारी मांगी गई, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला। यही चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है।

क्या रेलवे के पास माइक्रो-स्लीप से जुड़े ट्रायल का पूरा डेटा है? क्या इसकी आंतरिक समीक्षा हुई है? क्या लंबे ड्यूटी आवर्स और माइक्रो-स्लीप के बीच कोई संबंध पाया गया? इन सवालों का जवाब रेल यात्रियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

15 तीखे सवाल, जिनका जवाब रेलवे को देना होगा

1. अगर एआई कैमरे माइक्रो-स्लीप पकड़ रहे हैं तो कितने मामलों में अलार्म बजा?
2. कितने ड्राइवरों में माइक्रो-स्लीप के संकेत दर्ज हुए?
3. क्या ‘हर तीसरे ड्राइवर’ वाला दावा रेलवे के आधिकारिक डेटा से पुष्ट होता है?
4. रात 2 से सुबह 5 बजे के बीच ही जोखिम ज्यादा क्यों सामने आया?
5. क्या रेलवे ने माइक्रो-स्लीप और ड्यूटी घंटों के बीच संबंध का विश्लेषण किया?
6. क्या किसी ड्राइवर से लगातार 12-14 घंटे ड्यूटी कराने की शिकायतें सही हैं?
7. कितने लोको पायलट और एएलपी के पद वर्तमान में खाली हैं?
8. क्या सभी रनिंग स्टाफ को नियमानुसार साप्ताहिक विश्राम मिल रहा है?
9. क्या मुख्यालय विश्राम के नियमों का वास्तविक पालन हो रहा है?
10. कितने इंजनों में फटीग मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जा चुका है?
11. क्या वंदे भारत, राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों में यह सिस्टम अनिवार्य किया जाएगा?
12. माइक्रो-स्लीप मिलने पर चालक को केवल अलार्म दिया जाता है या ड्यूटी से हटाकर चिकित्सकीय/आराम प्रोटोकॉल भी लागू होता है?
13. एआई सिस्टम के अलर्ट की समीक्षा कौन करता है?
14. क्या आरडीएसओ और रेलवे बोर्ड ने ट्रायल रिपोर्ट सार्वजनिक की है?
15. यदि सिस्टम ने खतरे का संकेत दिया है तो रेलवे स्थायी समाधान कब लागू करेगा?

‘माइक्रो-स्लीप को अनुशासनहीनता न मानें’

एआईएलआरएसए के संगठन सचिव गौतम गोस्वामी ने कहा कि ड्राइवरों में झपकी और थकान का मुख्य कारण लगातार लंबी ड्यूटी है। उनका आरोप है कि ड्राइवरों से लगातार 12 से 14 घंटे तक ट्रेनें चलवाई जा रही हैं और कई बार उन्हें कई दिनों तक साप्ताहिक विश्राम नहीं मिल पाता।

गोस्वामी ने कहा कि माइक्रो-स्लीप को अनुशासनहीनता के तौर पर देखने के बजाय ड्यूटी आवर्स के उल्लंघन से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उन्होंने बड़े पैमाने पर खाली पदों को भरने, ड्राइवरों को नियमानुसार मुख्यालय विश्राम और साप्ताहिक अवकाश देने की मांग की।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रनिंग स्टाफ की कमी और ड्यूटी घंटों की समस्या दूर नहीं की गई तो रेल संरक्षा के मुद्दे पर संगठन आंदोलन करने को मजबूर होगा।

सबसे बड़ा सवाल

ट्रेन की रफ्तार पर एआई की नजर है… लेकिन ड्राइवर की थकान पर रेलवे की नजर कब पड़ेगी?







 

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