भारतीय बैंकिंग क्षेत्र से एक बड़ा और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पिछले 12 वित्तीय वर्षों के द...
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र से एक बड़ा और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पिछले 12 वित्तीय वर्षों के दौरान देश के कमर्शियल बैंकों ने बड़े कॉरपोरेट्स और सर्विस सेक्टर को दिए गए करीब ₹9,95,000 करोड़ (लगभग 10 लाख करोड़ रुपये) के फंसे हुए कर्ज (NPAs) को 'राइट-ऑफ' (Write-Off) यानी बट्टे खाते में डाल दिया है।
संसद में सोमवार को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने एक लिखित प्रश्न के उत्तर में बताया कि 2018-19 में बट्टे खाते में डाली गई रकम ₹1,48,753 करोड़ के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारी गिरावट के साथ घटकर मात्र ₹20,485 करोड़ रह गई है। इसके साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि बड़ी इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर पर कुल बकाया लोन का आकार वित्त वर्ष 2025 के ₹63,19,057 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में ₹69,21,734 करोड़ हो गया है।
🔄 क्या होता है बैंकों का राइट-ऑफ? सरकार ने कहा—'यह कर्जमाफी नहीं, केवल अकाउंटिंग प्रक्रिया है'
आम जनता के मन में उठने वाले इस सवाल पर कि क्या उद्योगपतियों का कर्ज माफ कर दिया गया है, वित्त राज्य मंत्री ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की:
अकाउंटिंग प्रक्रिया: बैंकों द्वारा लोन को बट्टे खाते (Write-Off) में डालना एक सामान्य अकाउंटिंग प्रोसेस है। इससे बैंक केवल अपनी बैलेंस शीट को संतुलित और स्वच्छ बनाते हैं।
देनदारी खत्म नहीं होती: राइट-ऑफ करने से कर्जदार (चाहे वह कॉरपोरेट हो या किसान) की कानूनी देनदारी खत्म या माफ नहीं होती है।
वसूली की कार्रवाई जारी: आरबीआई के 'स्ट्रेस्ड एसेट्स के सॉल्यूशन के लिए निर्देश 2025' के तहत बैंकों को यह अधिकार होता है। बट्टे खाते में डालने के बावजूद बैंक बकाएदारों से संपत्ति जब्त करने और कानूनी चैनलों के जरिए वसूली (Recovery) की प्रक्रिया निरंतर जारी रखते हैं।
📈 देश की राजकोषीय स्थिति और कैपेक्स में सुधार: महंगाई दर 2014 के बाद सबसे निचले स्तर पर
संसद में सरकार द्वारा देश के मुख्य आर्थिक संकेतकों पर भी आंकड़े प्रस्तुत किए गए:
घटता राजकोषीय घाटा: केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) 2020-21 में जीडीपी का 9.2 प्रतिशत था, जो 2025-26 (अनंतिम आंकड़े) में घटकर 4.4 प्रतिशत रह गया है।
कुल देनदारियां: देश की कुल बकाया देनदारियां 2020-21 के 61.5 फीसदी से घटकर 2025-26 में 58.2 फीसदी पर आ गई हैं।
कैपेक्स में उछाल: सरकारी पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) 2020-21 में ₹4.3 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹10.7 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है।
ऐतिहासिक रूप से कम महंगाई: खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) वर्ष 2025-26 में औसतन 2.1 प्रतिशत दर्ज की गई, जो कि 2014-15 के बाद का सबसे निचला स्तर है। वहीं, निजी उपभोग व्यय की वृद्धि दर बढ़कर 7.7 फीसदी हो गई है।
📉 बेरोजगारी दर घटकर 3.1% पर आई: डिजिटल पेमेंट फ्रॉड को लेकर सरकार सतर्क
लेबर सर्वे और डिजिटल सुरक्षा पर प्रस्तुत किए गए आंकड़े:
बेरोजगारी में गिरावट: 'पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे' (PLFS) के अनुसार, 15 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों के लिए सामान्य स्थिति में बेरोजगारी दर 2017-18 के 6 प्रतिशत से उल्लेखनीय रूप से घटकर 2025 में 3.1 प्रतिशत पर आ गई है।
डिजिटल फ्रॉड के मामले: पिछले पांच वित्तीय वर्षों के दौरान डिजिटल भुगतान से जुड़े कुल 5,85,751 धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए, जिनमें ₹3,590.70 करोड़ की राशि शामिल थी। सरकार, आरबीआई और एनपीसीआई (NPCI) ने साइबर सुरक्षा मजबूत करने और फ्रॉड डिटेक्शन प्रणालियों में सुधार के लिए कड़े कदम उठाए हैं।
🌐 भारत का विदेशी कर्ज पूरी तरह टिकाऊ और सुरक्षित: जीडीपी का 20.8% रहा अनुपात
भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति पर मंत्री ने भरोसा जताते हुए आंकड़े साझा किए:
कुल विदेशी कर्ज: मार्च 2026 के अंत तक भारत का कुल विदेशी कर्ज 762.8 अरब अमेरिकी डॉलर दर्ज किया गया।
सुरक्षित मानक: कुल विदेशी कर्ज और जीडीपी का अनुपात 20.8 प्रतिशत रहा। वहीं, भारत का फॉरेक्स रिजर्व कुल विदेशी कर्ज का 90.6 प्रतिशत कवर करता है।
शॉर्ट-टर्म कर्ज और डेट सर्विसिंग: जीडीपी के मुकाबले शॉर्ट-टर्म (अल्पकालिक) विदेशी कर्ज का अनुपात केवल 4.1 प्रतिशत रहा। इसके अतिरिक्त, कर्ज चुकाने का अनुपात (Date Service Ratio) मार्च 2025 के 6.6% से घटकर मार्च 2026 के अंत में 5.8% रह गया, जो दर्शाता है कि भारत का विदेशी कर्ज प्रबंधन पूरी तरह विवेकपूर्ण और सुरक्षित है।

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