नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल के छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों के आरोपों की स्वत...
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल के छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों के आरोपों की स्वतंत्र जांच का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने माना कि प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा मामला बनता है, जिसके लिए एक उच्च-स्तरीय निष्पक्ष और तटस्थ जांच की सख्त आवश्यकता है। इसके साथ ही अदालत ने बिना किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच, जिसमें जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, ने केंद्र सरकार के साथ-साथ दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, असम, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किए हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि देश भर में हुए प्रदर्शनों से जुड़े गंभीर आरोपों का समाधान केवल एक पारदर्शी और सबूत-आधारित जांच के माध्यम से ही किया जा सकता है।
📹 सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश: 18 वर्ष से कम उम्र के निर्दोष छात्र होंगे रिहा
कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में निर्देश दिया कि प्रदर्शनों से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-वियर कैमरा फुटेज, वायरलेस संचार रिकॉर्ड और पीसीआर कॉल डेटा को सुरक्षित रखा जाए। पुलिस को प्रदर्शनकारियों का व्यक्तिगत या डिजिटल डेटा सार्वजनिक करने से भी रोका गया है।
साथ ही, अदालत ने जांच जारी रहने तक प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। 18 वर्ष से कम आयु के सभी हिरासत में लिए गए नाबालिगों और बिना किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों को तुरंत रिहा करने का हुक्म दिया गया है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत असामाजिक तत्वों या आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी।
🏛️ "शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार, लेकिन कानून हाथ में लेने वालों पर होगी कार्रवाई": CJI की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान के तहत अपनी मांगें उठा रहे छात्रों का शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन पूरी तरह जायज है और इसे सुरक्षा प्राप्त है। हालांकि, उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अक्सर शांतिपूर्ण आंदोलनों में विशेष एजेंडे वाले असामाजिक तत्व घुस आते हैं और स्थिति को हिंसक बना देते हैं। पीठ ने सवाल उठाया कि जब दोनों पक्षों को नुकसान पहुंचा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं—गोपाल शंकरनारायणन, एएम सिंघवी, श्याम दीवान, प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर—ने कोर्ट में पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल, महिला प्रदर्शनकारियों व पत्रकारों से मारपीट और सादे कपड़ों में पुलिस हिंसा जैसे गंभीर आरोप दर्ज कराए।
🚓 हाई-पावर जांच कमेटी के गठन पर विचार: केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब, 3 अगस्त को अगली सुनवाई
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार स्वतंत्र जांच के खिलाफ नहीं है, लेकिन उन्होंने पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि हिंसा में 200 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं, इसलिए जांच ऐसी हो जिससे पुलिस बल का मनोबल प्रभावित न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बड़े पैमाने पर होने वाले आंदोलनों से निपटने के लिए एक स्थायी निष्पक्ष व्यवस्था की जरूरत है। अदालत दिल्ली से बाहर की घटनाओं की जांच के लिए एक 'हाई-पावर जांच कमेटी' बनाने पर विचार कर रही है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी, जिसके बाद कोर्ट स्वतंत्र जांच तंत्र और देश भर में प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।

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