नीट (NEET) पेपर लीक की वजह से 20 जून से जंतर-मंतर पर शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन अब राष्ट्रीय विमर्श का मुख्य मुद्दा बन चु...
नीट (NEET) पेपर लीक की वजह से 20 जून से जंतर-मंतर पर शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन अब राष्ट्रीय विमर्श का मुख्य मुद्दा बन चुका है। तमाम तरह के विरोध, हंगामे, टकराव और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर बढ़े राजनीतिक दबाव के बीच रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी ने शासन-प्रशासन तथा स्कूल-कॉलेज प्रबंधनों के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
छात्र कैसे सड़कों पर उतरने के बजाय क्लासरूम में रहें, इसको लेकर बेदी ने सबसे प्रमुख उपाय यह बताया है कि हर स्तर पर उनकी बात को सुना जाए और इसके लिए एक मजबूत व पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। उन्होंने एक विशेष लेख के जरिए कई सुधारात्मक कदम उठाने की सलाह दी है।
📉 'असली नुकसान जवाबदेही का होता है': किरण बेदी ने बताया क्यों फेल होता है सिस्टम
किरण बेदी सीजेपी आंदोलन के दौरान जारी विवादों का जिक्र करते हुए कहती हैं, "हाल के घटनाक्रम ने दो अलग-अलग नैरेटिव सामने रखे हैं। टीवी चैनल घायल पुलिसकर्मियों को दिखाते हैं, जबकि सोशल मीडिया पर घायल छात्रों और युवा आंदोलनकारियों की तस्वीरें शेयर की जाती हैं। दोनों में टकराव का एक ही पहलू है, लेकिन असली कहानी कहीं और है। असली नुकसान जवाबदेही (Accountability) का होता है।"
उन्होंने आगे कहा कि जब पुलिस और छात्र आमने-सामने टकराते हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि सिस्टम पहले ही विफल हो चुका है। शिकायतों को अनसुना किया गया, संवाद के रास्ते बंद हो गए और संस्थाओं ने भरोसा जगाना बंद कर दिया। इसके बाद पुलिस को ऐसी स्थिति संभालने के लिए बुलाया जाता है, जो कभी पैदा ही नहीं होनी चाहिए थी। इसलिए सवाल यह नहीं है कि कौन घायल हुआ, बल्कि सबसे जरूरी सवाल यह है कि इस तरह के टकराव को रोकने के लिए समय रहते क्या किया जा सकता था।
🚪 'संस्थानों के दरवाजे बंद होने पर सड़कों पर आते हैं छात्र': कमजोर सुनवाई प्रणाली पर उठाया सवाल
किरण बेदी ने कहा कि हर शैक्षणिक संस्थान शिक्षित करने, मार्गदर्शन देने और सही राह दिखाने के लिए बना है। वहीं, हर सार्वजनिक संस्थान नागरिकों की बात सुनने, उस पर प्रतिक्रिया देने और समस्याओं का समाधान निकालने के लिए है। जब इन प्राथमिक जिम्मेदारियों में ढिलाई आती है, तो जन-आक्रोश निकलकर सड़कों तक पहुंचता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्र इसलिए क्लासरूम छोड़कर सड़कों पर नहीं उतरते कि उन्हें विरोध-प्रदर्शन करने में मजा आता है। वे तब सड़कों पर आने के लिए मजबूर होते हैं, जब उन्हें लगता है कि जिम्मेदार संस्थानों के दरवाजे उनके लिए पूरी तरह बंद हो चुके हैं। यही वह जगह है जहां से वास्तविक प्रशासनिक सुधार की शुरुआत होनी चाहिए।
⏱️ 'बिना प्रोटोकॉल हर दिन हो सुनवाई': VC, प्रिंसिपल और अफसरों के लिए दिए सीधे निर्देश
किरण बेदी ने सलाह दी कि जनसुनवाई की प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। सभी यूनिवर्सिटीज के वाइस चांसलर (VC), कॉलेजों के प्रिंसिपल, डायरेक्टर्स और डीन को हर दिन छात्रों की समस्याएं सुनने के लिए एक निश्चित समय तय करना चाहिए, जिसके लिए किसी पूर्व अपॉइंटमेंट या औपचारिक प्रोटोकॉल की आवश्यकता न हो।
उन्होंने कहा कि छात्रों को सुने जाने का केवल एक निष्पक्ष मौका ही अक्सर बड़े आक्रोश को जन-आंदोलन बनने से रोकने के लिए काफी होता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सभी नौकरशाहों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी आम जनता व छात्रों से संवाद के लिए हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए।
💻 शिकायतों के निपटारे की पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था और काउंसलिंग की सलाह
देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी ने सुझाव दिया कि छात्रों की सभी शिकायतों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज करने और उन्हें ट्रैक करने की पारदर्शी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। छात्रों को स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि उनकी शिकायत के लिए कौन सा अधिकारी जिम्मेदार है, अब तक क्या ऐक्शन लिया गया है और कब तक उन्हें अंतिम फैसले की उम्मीद रखनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने संस्थानों में लगातार संवाद और पेशेवर काउंसलिंग की व्यवस्था स्थापित करने पर जोर दिया।
🛡️ 'तुरंत पुलिस को आगे न लाएं': लाठी-हथियार रहित सिविल डिफेंस को पहले तैनात करने का सुझाव
किरण बेदी ने एक बेहद महत्वपूर्ण सलाह देते हुए कहा कि यदि छात्र किसी मुद्दे पर आंदोलन करते हैं, तो प्रशासन को उनके सामने सीधे पुलिस को खड़ा नहीं करना चाहिए। इसके बजाय सबसे पहले 'सिविल डिफेंस' (Civil Defence) के जवानों को आगे किया जाना चाहिए।
बेदी की सलाह है कि इन सिविल डिफेंस कर्मियों के हाथों में लाठी या कोई अन्य हथियार नहीं होना चाहिए, ताकि माहौल तनावपूर्ण न बने। पुलिस को हमेशा पीछे की पंक्ति में रहना चाहिए और केवल तभी आगे आना चाहिए जब स्थिति अत्यधिक बेकाबू हो जाए या जान-माल की सुरक्षा का गंभीर खतरा पैदा हो।

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