साहित्य सरोकार : है नमन उनको, जिन्होंने खून से सींचा हिमालय, कारगिल की चोटियों पर अपनी जवानी लाल कर दी। जो लड़े माँ भारती का ऋण चुकाने के...
साहित्य सरोकार :
है नमन उनको, जिन्होंने खून से सींचा हिमालय,
कारगिल की चोटियों पर अपनी जवानी लाल कर दी।
जो लड़े माँ भारती का ऋण चुकाने के लिए,
अपने लहू से आखिरी विजय की शंखनाद कर दी।
एक अंधेरी रात थी, दुश्मन की छिपी टोलियां,
भेड़ियों-सी चाल चल कब्जा किया कारगिल की चोटियां।
मकसद था लेह-लद्दाख को कश्मीर से अलग करना,
और सियाचिन को भारत के मानचित्र से विलग करना।
पर वह भूल गया पैंसठ और इकहत्तर की हार,
नब्बे हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का इतिहास।
फिर द्रास की वादियों में गूंजी रण की हुंकार,
कैप्टन विक्रम बत्रा ने भर दी वीरता की ललकार।
नाम, नमक और निशान पर जो हँसकर हुए शहीद,
उनकी अमर गाथा गाता है हिमालय सदा अडिग।
कारगिल की चोटियों पर जब तक सूर्य-चाँद रहेगा,
अमर शहीदों का यश हर भारतवासी के हृदय में सदा जीवित रहेगा।

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