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दिल्ली सरकारी अस्पताल ऐप: हाईकोर्ट ने दिया ऑडिट का आदेश, ऐप फेल

  दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के ‘हाईटेक’ होने के सरकारी दावों की हवा किसी बड़े अफसर या नेता ने नहीं, बल्कि 11वीं क्लास की एक छात्रा ने निकाल...

 


दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के ‘हाईटेक’ होने के सरकारी दावों की हवा किसी बड़े अफसर या नेता ने नहीं, बल्कि 11वीं क्लास की एक छात्रा ने निकाल दी। हाईकोर्ट में एक तरफ सरकार हलफनामा देकर दावा कर रही थी कि उसके 38 सरकारी अस्पताल ‘नेक्स्टजेन ई-हॉस्पिटल’ ऐप के जरिये बेहतरीन काम कर रहे हैं। दूसरी तरफ कोर्ट में खड़ी एक छात्रा की आपबीती ने इस दावे को खोखला साबित कर दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने इस ऐप का ऑडिट कराने के आदेश दिए हैं।

इस मामले की सुनवाई के दौरान तब चौंकाने वाली स्थिति पैदा हो गई, जब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने छात्रा की शिकायत पर सच्चाई जानने के लिए भरी अदालत में खुद ही 'नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप' पर दिए गए नंबरों को डायल करवाया। कई बार रिंग जाने के बाद भी किसी ने फोन नहीं उठाया। इस लाइव रियलिटी चेक से नाराज बेंच ने तत्काल इस ऐप के डेमो को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए नेक्स्टजेन टीम के अफसरों को खुद दिल्ली के सभी 38 अस्पतालों में जाकर ऐप की जमीनी हकीकत का पता लगाने और 7 अगस्त को अगली सुनवाई तक ऑडिट रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता नहीं : हाईकोर्ट

अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए दिल्ली सरकार को आदेश दिया है कि 30 जून से घर पर ही गंभीर हालत में पड़ी 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला को तुरंत आईसीयू बेड मुहैया कराया जाए। बेंच ने सरकार के सभी अस्पतालों से उन सभी मशीनों की लिस्ट भी मांगी है, जो फिलहाल खराब या बंद पड़ी हैं।

छात्रा की सूझबूझ और बुजुर्ग दादी का दर्द

घटना बीते 30 जून 2026 की है। छात्रा ने बेंच को बताया कि उसकी 70 वर्षीय दादी को ब्रेन हैमरेज हुआ था। वह उन्हें लेकर पहले दिल्ली सरकार के जगप्रवेश चंद अस्पताल पहुंची, जहां आईसीयू बेड न होने पर एलएनजेपी या जीटीबी अस्पताल भेज दिया गया। एलएनजेपी अस्पताल में भी बेड नहीं मिला। परेशान छात्रा ने हाईकोर्ट के न्यायमित्र अशोक अग्रवाल से संपर्क किया, जिन्होंने उसे 'नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप' के हेल्पलाइन पर बात करने की सलाह दी। छात्रा ने ऐप पर दिए गए तीन नंबरों पर कॉल किया, तो एक नंबर वहां के गार्ड ने उठाया और बेड की जानकारी होने से इनकार कर दिया।

ऐप को लेकर दावे

1. रीयल टाइम डेटा :अक्सर मरीजों को गंभीर स्थिति में अस्पतालों में भटकना पड़ता है। इससे उन्हें वेंटिलेटर-आईसीयू और बेड की स्थिति का पता चलेगा।

2. पारदर्शिता:इस ऐप का मकसद सरकारी अस्पतालों में मरीजों और आईसीयू बेड की लाइव स्थिति आम जनता और एम्बुलेंस सेवाओं को दिखाना है।

यह काम कैसे करता है?

सरकार के दावे के मुताबिक, यह एक एकीकृत हॉस्पिटल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम है। इसके कुल 14 मॉड्यूल्स हैं, जिसमें ऑनलाइन जानकारियां आसानी से मिलती हैं।

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