दैनिक सरोकार ! निशांत शर्मा / नोएडा : इंटरनेट की दुनिया ने लोगों के जीवन को काफी सरल बना दिया है, लेकिन दुनियाभर में इंटरनेट का दुरुपयोग भ...
दैनिक सरोकार ! निशांत शर्मा / नोएडा :
इंटरनेट की दुनिया ने लोगों के जीवन को काफी सरल बना दिया है, लेकिन दुनियाभर में इंटरनेट का दुरुपयोग भी बढ़ता जा रहा है। अनेक देशों में साइबर अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। साइबर अपराध किसी भी बड़ी कम्पनी, राजनीतिक पार्टियों और किसी भी आम व्यक्ति के साथ किया जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भारत ऐसा देश हैं जहां सबसे अधिक साइबर अपराध के मामलों सामने आए हैं। पुलिस साइबर अपराधों से निपटने में बेहतर रूप से भले ही सुसज्जित हो गई हो लेकिन देश में साइबर अपराध दोष-सिद्धि अनुपात खराब बना हुआ है। इसके अपराधी नाम बदलकर नए नए तरीके अपनाकर जालसाजी को अंजाम देते हैं। तेजी से बढ़ते आनलाइन कामकाज, आम नागरिकों समेत पुलिस तक में जागरूकता और तकनीक की जानकारी के अभाव, छिपी हुई यूजर पालिसी, साइबर क्राइम मामले में जांच की मुश्किलें और डाटा सुरक्षा कानून नहीं होने के चलते डिजिटल अपराध में वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार बीते एक दशक में राष्ट्रीय स्तर पर साइबर क्राइम में बेतहाशा वृद्धि हुई है। यह हमारे लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। इंटरनेट और टेक्नोलाजी से लैस नई डिजिटल दुनिया में अनचाहे काल, अनजाना मैसेज, अवांछित ईमेल, अपिरिचत फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट लोगों को डराने लगे हैं। ऐसे ही अनर्गल मीम्स, अननेचुरल पिक्चर, वीडियो, लाटरी, बिजनेस गेम, डिस्काउंट लिंक, आफर वाले तमाम एप और गैर जरूरी बैंकिंग इनफार्मेशन के जाल में लोग आसानी से फंसाए जा रहे हैं, जबकि आनलाइन कामकाज दिनों-दिन मुश्किल होता जा है। छोटी-बड़ी खरीदारी से लेकर रकम के ट्रांजेक्शन, बात-बात पर सूचना-संपर्क और जानकारी जुटाने के लिए आनलाइन या लाइव होना रोजमर्रा की आवश्यकताओं में शामिल हो चुका है। इसी के साथ साइबर अपराध की आशंकाएं भी फन फैलाए हुए है। इनसे बचाव के लिए किए गए उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं। बीते एक दशक के दरम्यान उसमें हुई बेतहाशा वृद्धि की वजह से 6 फरवरी को सरकार की ओर से लोकसभा में दिए गए एक जवाब के मुताबिक साल 2023 में वित्तीय साइबर धोखाधड़ी के कुल 11.28 लाख मामले सामने आए. देश में साइबर फ्रॉड के मामलों में सबसे अधिक केस उत्तर प्रदेश से दर्ज किए गए, इस मामले में एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि वास्तव में घटित होने वाले अपराध के केवल एक तिहाई मामले ही पुलिस में दर्ज होते हैं। यानी इस तरह के हो रहे अपराध की तुलना में चार्जशीट रेट और रिपोर्ट रेट भी काफी कम है। लोग अपने साथ हुई घटना की रिपोर्ट नहीं करते हैं या फिर उनकी सुनवाई नहीं होती है। *क्या है इसके कानून* भारत सरकार ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्यौगिकी अधिनियम 2000 पारित किया था, साथ ही IPC की धाराओं में भी कुछ प्रावधान किए गए। सूचना प्रौद्यौगिकी अधिनियम 2000 की धाराऐं 43 43ए, 66 66बी, 66सी, 66डी, 66ई, 66 एफ, 67, 67ए, 67बी, 70, 72, 72ए और हैकिंग व साइबर क्राइम से संबंधित है। इसके अलावा 2013 में सरकार ने राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति जारी की, जिसमें अतिसंवेदनशील मुद्दों के संरक्षण को लेकर मसौदा तैयार किया गया। इसके तहत 2 वर्ष की सजा से लेकर उम्रकैद, दंड और जुर्माने का भी प्राविधान है। वहीं 2020 में गृह मंत्रालय ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए भारतीय अपराध समन्वय केन्द्र का उद्घाटन किया गया। इसके अलावा भारत इस सिलसिले में अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसे देशों के साथ भी समन्वय भी कर रहा है। अब पुलिस के सामने मुश्किल यह है िक डाटा चुराने वाला किसी दूसरे देश से संचालित सिस्टम के साथ छिपा होता है। यहां पुलिस के जो सामने आता है, उनमें आइटी कंपनियां होती हैं। उन पर कार्रवाई करने से कुछ भी हाथ नहीं लगता है, क्योंकि वे अपने बचाव के सारे तकनीकी इंतजाम के साथ सेवाएं देती हैं। डाटा सुरक्षा के लिए विदेशी कंपनियों को मोटी फीस देकर वे उनकी सेवाएं लेते हैं। यहां तक कि बाहरी सर्वर पर ही उनका सारा कामकाज चलता है। इस लिहाज से उनके काम को गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता है। उनकी सेवा विदेशी सर्वर की नीतियों के साथ जुड़ी होती हैं। यहीं पर आइटी क्षेत्र के लिए आवश्यक सर्वर टेक्नोलाजी और डाटा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम में हमारा पिछड़ा होना साफ नजर आता है। आज डिजिटल क्षेत्र में हमारी निर्भरता अमेरिकी कंपनियों पर बनी हुई है। यहां चौंकाने वाली बात यह भी है कि अमेरिका की हजारों बड़ी आइटी कंपनियों की निगाह भारत पर टिकी हुई है। यहीं से उनका बिजनेस चलता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस कारण भी हमारी पुलिस साइबर क्राइम के छोटे तालाब की मछली तक को नहीं पकड़ पा रही है। उनके लिए साइबर मामलों को सुलझाने में अधिकार क्षेत्र बड़ी बाधा बनती है। जिससे साइबर ठग के सजा की दर काफी कम है। उदाहरण के लिए दिल्ली में रिपोर्ट किए गए अधिकांश मामलों में आरोपी बंगाल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों के होते हैं। स्थानीय स्तर पर इन्हें नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां जाना और उन्हें पकड़ना भी आसान नहीं है। ऐसा दिल्ली की पुलिस का कहना है। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के मुद्दे साइबर क्राइम को अपराधी से जोड़ना मुश्किल बना सकते हैं। अक्सर भारत के बाहर सर्वर की सर्विस देने वाली कंपनियों से इलेक्ट्रानिक लाग प्राप्त करना आवश्यक होता है। उनसे इस जानकारी को हासिल करना एक राज्य स्तरीय पुलिस के लिए आसान नहीं है। पुलिस साइबर अपराधों से निपटने में बेहतर रूप से भले ही सुसज्जित हो गई हो, लेकिन देश में साइबर अपराध दोष-सिद्धि अनुपात खराब बना हुआ है। इसके अपराधी नाम बदलकर नए नए तरीके अपनाकर जालसाजी को अंजाम देते हैं। हालांकि पुलिस का दावा है कि साइबर अपराधों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाकर उसमें कमी लाई जा सकती है। जबकि भारत सरकार ने इसके खिलाफ कदम उठाते हुए एक वेबसाइट शुरू की है। वहां जाकर आनलाइन धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज की जा सकती है। यह पोर्टल साइबर अपराध की शिकायतों की आनलाइन रिपोर्ट करने के लिए है, जहां पीड़ितों या शिकायतकर्ताओं को मदद उपलब्ध कराई जाएगी। यहां दर्ज की गई शिकायतों को संबंधित राज्य की पुलिस, राजकीय या केंद्रीय कानूनी एजेंसियों की ओर से दी गई सूचनाओं के आधार पर निपटाया जाता है। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए शिकायत दर्ज करते समय सटीक जानकारी देना जरूरी है। सूचनाएं सही हों तो जांच एजेंसियों को अपराधी तक पहुंचने में मदद मिलती है। इसके लिए तमाम विभागों के बीच समन्वय का प्रयास किया जा रहा है। *(लेखक का आईटी क्षेत्र में 16 वर्षों का अनुभव है)*
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