दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि किसी ससुर को केवल इस आधार पर घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण (DV) अधिनियम के ...
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि किसी ससुर को केवल इस आधार पर घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण (DV) अधिनियम के तहत जिम्मेदार नहीं माना जा सकता कि वह अपने बेटे के आचरण को नियंत्रित करने में असफल रहा। जस्टिस मधु जैन ने एक महिला की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। महिला ने निचली अदालत के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें उसके ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले में कार्यवाही आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया गया था।
🔍 कानूनी दायरे और धारा 3 की व्याख्या: अदालत बोली- मौखिक और भावनात्मक शोषण साबित करने के लिए ठोस तथ्य जरूरी
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-3 के तहत ऐसा आचरण शामिल है जिससे शारीरिक या मानसिक क्षति होती है। हालांकि, केवल पक्षकारों के बीच घरेलू संबंध होना इस धारा को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस मामले में ससुर की कथित वैवाहिक दुर्व्यवहार में कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि 'अपमानित करना' और 'गाली देना' जैसे आरोप केवल नतीजे हैं, और इनके समर्थन में ठोस तथ्यों के बिना इन्हें DV एक्ट के तहत मौखिक या भावनात्मक शोषण नहीं माना जा सकता।

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