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Russian Oil Import India News: अमेरिकी टैरिफ के दबाव में तेल सोर्स बदला तो बढ़ जाएगा खर्च, महंगे ईंधन से देश को होगा भारी घाटा

यदि भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव से बचने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात कम करके किसी दूसरे देश से आपूर्ति लेता है, तो देश को एक साल में 35 हज...



यदि भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव से बचने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात कम करके किसी दूसरे देश से आपूर्ति लेता है, तो देश को एक साल में 35 हजार करोड़ रुपए से अधिक का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत रूस से आने वाले प्रतिदिन 1 मिलियन बैरल (bpd) तेल की जगह ऐसे विकल्प का इस्तेमाल करता है जो 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल महंगा है, तो देश को सालाना 1.8 से 3.7 अरब डॉलर का अतिरिक्त तेल बिल चुकाना होगा. इससे साफ साबित होता है कि टैरिफ के प्रेशर में आकर ऊर्जा स्रोतों में बदलाव करने से आयात लागत में जबरदस्त उछाल आएगा.

🇷🇺 2. रूस की हिस्सेदारी कुल आयात का 42 फीसदी, कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया काटोना ने ऊर्जा सुरक्षा को बताया सर्वोपरि

फ्रीलांस कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया काटोना के मुताबिक, अगस्त महीने में अकेले रूस ने भारत को लगभग 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तेल की आपूर्ति की है, जो भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का करीब 42 फीसदी हिस्सा है. भारतीय अधिकारियों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सबसे सर्वोपरि हैं, इसलिए रूसी तेल से पूरी तरह पीछे हटने के बजाय भारत अपने सप्लाई स्रोतों में विविधता बनाए रखेगा. साथ ही, अक्टूबर से मार्च-अप्रैल तक चलने वाले ईंधन मांग के पीक सीजन के दौरान रिफाइनरीज अपनी पूरी क्षमता से काम करेंगी, जिससे आयात में बड़ी कटौती की गुंजाइश बेहद कम है.

🚢 3. ढुलाई का भारी खर्च और सीमित उपलब्धता बड़ी चुनौती, पश्चिम एशिया ही बनेगा सबसे स्वाभाविक विकल्प

आईसीएआरए (ICRA) के सीनियर वाइस-प्रेसीडेंट प्रशांत वशिष्ठ और केप्लर (Kpler) के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे का कहना है कि जुलाई में भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 52 फीसदी थी, जिसे रातों-रात बदलना असंभव है. दूरदराज के देशों जैसे ब्राजील या अमेरिका से तेल मंगाने पर ढुलाई (फ्रेट) का खर्च बहुत ज्यादा आता है और ग्लोबल बाजार में सीमित कार्गो के कारण कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा. जानकारों का मानना है कि ऐसे हालात में कम लागत और कम समय के लिहाज से पश्चिम एशिया (खाड़ी देश) ही भारत के लिए सबसे स्वाभाविक और व्यावहारिक विकल्प साबित होगा.







 

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