जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली में मिलते हैं, तो सबसे अहम तस्वीर एक बार फिर भार...
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली में मिलते हैं, तो सबसे अहम तस्वीर एक बार फिर भारत, चीन और रूस के नेताओं के हाथ मिलाने और साथ खड़े होने की होती है. तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के एक साल बाद, ये तीनों एक ऐसे ब्रिक्स में मिल रहे हैं जो आकार में बड़ा है, राजनीतिक रूप से अधिक बंटा हुआ है और जिस पर पश्चिमी देशों का दबाव भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है. शी जिनपिंग जहां लंबे समय बाद भारत आ रहे हैं, वहीं पुतिन और मोदी के साथ यह कूटनीतिक संवाद वैश्विक स्तर पर नए समीकरणों को जन्म दे रहा है.
💰 2. ब्रिक्स का लगातार बढ़ता दायरा और वित्तीय चुनौतियां, डॉलर के विकल्प पर तलाश और न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका
2001 में एक साधारण आर्थिक अवधारणा के रूप में शुरू हुआ ब्रिक्स अब दुनिया की लगभग 49% आबादी, 39% ग्लोबल GDP और 23% अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाला बड़ा समूह बन चुका है. हालांकि, इसका विशाल दायरा ही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है क्योंकि समूह के पास कोई स्थायी सचिवालय नहीं है और फैसले आम सहमति से होते हैं. इसके बावजूद, सदस्य देश आपसी व्यापार को बढ़ावा देने, लोकल करेंसी के इस्तेमाल और सीमा-पार पेमेंट सिस्टम को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिसमें 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
🤝 3. भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की उम्मीदें, सीमा विवाद और व्यापारिक संतुलन बनाए रखने की रणनीतिक परीक्षा
गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के रिश्तों में आए ठहराव के बीच दोनों देशों के बीच संवाद बहाल होना एक सकारात्मक कदम है. भारत का रुख स्पष्ट है कि वह ब्रिक्स को किसी अमेरिका-विरोधी गुट के रूप में नहीं बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के एक और मंच के रूप में देखता है. दोनों एशियाई दिग्गजों के लिए सीमा पर शांति स्थापित करना, व्यापारिक अड़चनों को दूर करना और आर्थिक जुड़ाव को संतुलित रखना बेहद जरूरी है ताकि यह मंच केवल दिखावे तक सीमित न रहकर वास्तविक कूटनीतिक और आर्थिक लाभ दे सके.

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