दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए हर साल देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में छात्र आते हैं, लेकिन सभी छात्रों के लिए हॉस्टल की सुविध...
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए हर साल देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में छात्र आते हैं, लेकिन सभी छात्रों के लिए हॉस्टल की सुविधा उपलब्ध होना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. सीमित सीटों और कई कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा न होने के कारण स्टूडेंट्स को मजबूरन प्राइवेट पीजी, किराये के कमरे या फ्लैटों में रहना पड़ता है. इससे न केवल छात्रों का मासिक खर्च कई गुना बढ़ जाता है, बल्कि सुरक्षित आवास को लेकर अभिभावकों की चिंताएं भी हमेशा बनी रहती हैं.
📊 2. डीयू के 69 से अधिक कॉलेजों में केवल 8 से 9 हजार हॉस्टल सीटें, जबकि हर साल 70 हजार से ज्यादा नए छात्र लेते हैं एडमिशन
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी कॉलेजों के हॉस्टल मिलाकर कुल 8 से 9 हजार सीटें ही उपलब्ध हैं, जबकि हर साल अकेले अंडरग्रेजुएट कोर्सेज में 70 हजार से ज्यादा नए छात्र एडमिशन लेते हैं. इसके अलावा, शहीद भगत सिंह कॉलेज, कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज, महाराजा अग्रसेन, श्याम लाल, पीजीडीएवी, सत्यवती, शिवाजी और स्वामी श्रद्धानंद जैसे कई प्रतिष्ठित कॉलेजों में तो इन-हाउस हॉस्टल की सुविधा ही नहीं है, जिसके कारण छात्रों को पूरी तरह निजी आवासों पर निर्भर रहना पड़ता है.
💰 3. नॉर्थ और साउथ कैंपस के आसपास आसमान छू रहे पीजी और कमरे के किराए, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ रहा भारी असर
हॉस्टल न मिलने की स्थिति में छात्रों को दिल्ली के महंगे पीजी या फ्लैटों का रुख करना पड़ता है, जहां नॉर्थ और साउथ कैंपस के आसपास सामान्य पीजी का किराया 12 हजार से 20 हजार रुपये महीने तक पहुंच जाता है. इसमें बिजली और खाने का खर्च अलग से होता है, जो मध्यम और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के परिवारों के लिए वहन करना बेहद कठिन हो जाता है. दक्षिण दिल्ली के सत्यनिकेतन में हुए हालिया हादसों ने इस विकराल होती समस्या और छात्रों की सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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