साल 2026 और राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर सुरक्षा की मांग को लेकर महिलाएं उतर आई हैं। 3 साल की बच्ची से लेकर 70 साल की बुजुर्ग तक क...
साल 2026 और राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर सुरक्षा की मांग को लेकर महिलाएं उतर आई हैं। 3 साल की बच्ची से लेकर 70 साल की बुजुर्ग तक के साथ हो रहे अपराध, छेड़छाड़, प्रताड़ना और गैंगरेप जैसी घटनाओं ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। ताजा मामला दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ हुए गैंगरेप का है। आजादी के 80 साल बाद भी महिला सुरक्षा देश की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है, जहां नारेबाजी के जरिए महिलाएं अपना हक मांग रही हैं।
📢 विरोध प्रदर्शनों में लगे नारों पर क्यों शुरू हुई बहस? पुरुषों के खेमे से उठा 'हर मर्द एक नहीं होता' का सवाल
महिला सुरक्षा की इस गूंज के बीच पुरुषों के एक वर्ग से यह आवाज उठने लगी है कि 'हर मर्द एक नहीं होता।' इसकी मुख्य वजह प्रदर्शनों के दौरान लगाए जाने वाले कुछ खास नारे हैं— जैसे "एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा", "एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय-हाय" और "मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है"। विरोध कर रहे पुरुषों का तर्क है कि इन नारों में पूरे पुरुष वर्ग का सामान्यीकरण किया गया है, यानी कुछ लोगों के व्यवहार को पूरे समाज से जोड़कर देखा जा रहा है।
⚖️ मुहावरों और गालियों का सामाजिक इतिहास बनाम नारों पर आपत्ति
इस बहस के दूसरे पहलू में सदियों से समाज और साहित्य में चले आ रहे उन मुहावरों और गालियों पर भी सवाल खड़े होते हैं, जो महिलाओं के खिलाफ नकारात्मक धारणाएं गढ़ते हैं। हालांकि, लेखक का मानना है कि दोनों पक्षों की बातों में अपनी जगह तर्क हैं, लेकिन इन तीखी बहसों और नारों के फेर में 'महिला सुरक्षा' का असली और गंभीर मुद्दा कहीं दम तोड़ता नजर आ रहा है। आंदोलन की भाषा और उसकी मूल मांग को अलग रखकर प्राथमिकता तय करना इस समय सबसे ज्यादा जरूरी है।

कोई टिप्पणी नहीं