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AQI Crisis in Delhi: सिर्फ एक्यूआई नहीं बल्कि प्रदूषण के सोर्स पर होगी पैनी नजर, यूपी के 8 एनसीआर जिलों में मशीनों से होगी डीप क्लीनिंग

अक्टूबर का महीना आते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार खराब होने लगती है. हालांकि, इस बार प्रदूषण बढ़ने का इंतजार करने के बजाय प्रशासन ने पहले ...

अक्टूबर का महीना आते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार खराब होने लगती है. हालांकि, इस बार प्रदूषण बढ़ने का इंतजार करने के बजाय प्रशासन ने पहले से ही कमर कस ली है. सड़क की धूल, गाड़ियों के धुएं, कंस्ट्रक्शन, फैक्ट्रियों और पराली जैसे हर प्रदूषण स्रोत पर एक साथ कड़ा प्रहार करने का पूरा प्लान तैयार किया गया है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इस बार सर्दियों के दस्तक देने से पहले ही पूरे प्रशासनिक तंत्र को एक्टिव कर दिया गया है ताकि समय रहते जहरीली हवा पर लगाम लगाई जा सके.

📊 क्यों बिगड़ता है दिल्ली का AQI? प्रदूषण के इन मुख्य कारणों पर हो रहा है काम

दिल्ली-एनसीआर की हवा को खराब करने में कई कारक जिम्मेदार हैं, जिसमें सड़कों पर जमी धूल, वाहनों व उद्योगों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों का मलबा और खुले में कचरा जलाना शामिल है. इसके अलावा सर्दियों के मौसम में मौसमी बदलाव के कारण हवा का पैटर्न ऐसा हो जाता है कि प्रदूषण जमीन के पास ही मंडराने लगता है. हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की बैठक में भी एनसीआर की हवा को शुद्ध करने के लिए इन तमाम बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है.

🚜 सड़क की धूल पर मशीनों का वार और घटते पराली के आंकड़े

यूपी के एनसीआर वाले 8 जिलों में अब सड़कों की डीप क्लीनिंग मैकेनिकल मशीनों के जरिए की जाएगी ताकि महीन धूल उड़कर हवा में पीएम 10 और पीएम 2.5 का स्तर न बढ़ाए. इसी तरह दिल्ली में भी छोटी और संकरी सड़कों की सफाई के लिए 30 इलेक्ट्रिक मैकेनिकल स्वीपिंग मशीनें तैनात की जा रही हैं. दूसरी ओर, पिछले कुछ सालों के आंकड़े गवाह हैं कि पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई है. वर्ष 2021 में जहां ये आंकड़े 78,550 थे, वहीं 2025 में घटकर करीब 6,080 रह गए हैं. हालांकि इसके बावजूद हवा का संकट पूरी तरह टला नहीं है.

🔍 सिर्फ AQI नहीं, अब उसके पीछे के 'सोर्स' की होगी रियल-टाइम मॉनिटरिंग

इस बार रणनीति सिर्फ एक्यूआई देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पता लगाने पर जोर है कि प्रदूषण आखिर किस वजह से बढ़ा है—ट्रैफिक, धूल, कंस्ट्रक्शन या कचरा जलाने से? इसके लिए उद्योगों में ऑनलाइन कंटीन्यूअस एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम (OCEMS) लगाए गए हैं. साथ ही CAQM द्वारा नया जीआरएपी (GRAP) भी इस तरह डिजाइन किया गया है कि हालात बेहद खराब होने का इंतजार करने के बजाय मौसम के पूर्वानुमान को देखकर ही कुछ कदम पहले ही एहतियाती पाबंदियां लागू कर दी जाएं.







 

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